Wednesday, January 13, 2010
सपनो का आशियाँ
Monday, January 11, 2010
एहसास गुमशुदा रहता है
Tuesday, January 5, 2010
आज फिर दिल चाहता है
दोहराना फिर वह वाक़या, आज फिर दिल चाहता है
अजनबी की तरह, हम तुम मिले थे एक दिन
सोचा न था यह दोस्ती इतनी बढ़ेगी एक दिन
प्यार तुझसे क्या हुआ, सोचा तुझे बस रात दिन
एहसास में घुलती गयी, तेरा नशा बढ़ा रात दिन
अजनबी बनकर यूँ मिलना, आज फिर दिल चाहता है
नव प्रेम का वह नशा, आज फिर दिल चाहता है
प्यार के उपवन में आंधी, किस्मत की फिर ऐसी चली
सपनो के पत्ते झड़ गए, ख्वाबो की टूटी हर कली
अरमानो के ठूंठों के बीच फिर बहारे न पली
हो गयी जब तू जुड़ा तो क्या करे ज़िंदादिली
इस निकुंज को फिर बसाना, आज फिर दिल चाहता है
इस ज़िन्दगी में ज़िंदादिली, आज फिर दिल चाहता है
Tuesday, December 15, 2009
इतिहास लिखेंगे
सच्चे शब्दों में सच के अहसास लिखेंगे,
वक्त पढे जिसको कुछ इतना खास लिखेंगे |
गीत गजल हम पर लिखेंगे लिखने वाले,
हमने कलम उठाई तो इतिहास लिखेंगे ||
गीत गजल हम पर लिखेंगे लिखने वाले,
हमने कलम उठाई तो इतिहास लिखेंगे......
गीत गजल हम पर लिखेंगे लिखने वाले,
हमने कलम उठाई तो इतिहास लिखेंगे....
Sunday, December 13, 2009
कवि का कार्य
Wednesday, December 9, 2009
कब जाने खुद को भूल गया
Saturday, October 17, 2009
कोई खरीददार न रहा
हार के हम बिकने आये, पर आज कोई बाज़ार न रहा,
मायूस खड़े हैं बीच चौराहे, कोई खरीददार न रहा..........
एक समय था गली मोहल्ले, ऊँची बोली लगती थी,
बड़े व्यापारियों के चेहते थे, चमचम रेहड़ी सजती थी,
वही पुराने जमघट लगते, बस हमसे साक्षात्कार न रहा.....
मायूस खड़े हैं बीच चौराहे, कोई खरीददार न रहा..........
हर विज्ञापन की जान भी हम थे, हर मेले का मेहमान भी हम थे,
थे किसी के शौक नवाबी, और जरुरत का सामान भी हम थे,
माल अभी भी वही है खालिस, पर कोई लेनदार न रहा.......
मायूस खड़े हैं बीच चौराहे, कोई खरीददार न रहा..........