Wednesday, January 13, 2010

सपनो का आशियाँ

सपने सच होते अगर तो, एक बनाता आशियाँ,
खुशनुमा रंगी महल, जहाँ कदमो तले हो अह्कशां...

कल्पना की छत तले, सपनो से सजे फर्श हो,,
दीवार के हर एक कण में, उम्मीद का स्पर्श हो,
नीव का हर एक पत्थर, विश्वास से होता जमा,
खुशनुमा रंगी महल जहाँ कदमो तले हो अह्कशां......

आवभगत करते दरवाजे, नम्रता की दहलीज़ हो,,
उल्लास वर्णों से रंगी कमरे की हर एक चीज़ हो,
आरज़ू के निकुंज में, होता अनुभवी बागबां,
खुशनुमा रंगी महल, जहाँ कदमो तले हो अह्कशां......

आस्था के स्वरुप का, उपासना स्थान हो,
न रहीम, न यीशू, न ही वो भगवान हो, `
स्वछन्द मुक्त भावों में, विकारो का न हो निशाँ,
खुशनुमा रंगी महल, जहाँ कदमो तले हो अह्कशां......

Monday, January 11, 2010

एहसास गुमशुदा रहता है

आँखों के तले इक दरिया है,
पर जाने क्यूँ नहीं बहता है,,,
चादर ढक सोती उम्मीदें,
मन भारी-भारी रहता है.....

अवसाद नहीं है मुझको फिर भी,
इक खलिश का आलम रहता है,,,
जड़ पत्थर हो गयी हैं आँखें,
जाने क्या चलता रहता है.....
चादर ढक सोती उम्मीदें, मन भारी-भारी रहता है.....

जमती यारों संग महफ़िल भी,
बस मुझमे विराना रहता है,,,
हँसता दुनिया के संग मै भी
पर एहसास गुमशुदा रहता है.....
चादर ढक सोती उम्मीदें, मन भारी-भारी रहता है.....

Tuesday, January 5, 2010

आज फिर दिल चाहता है

मिलना तस्सवुर में तुझे, आज फिर दिल चाहता है
दोहराना फिर वह वाक़या, आज फिर दिल चाहता है


अजनबी की तरह, हम तुम मिले थे एक दिन
सोचा न था यह दोस्ती इतनी बढ़ेगी एक दिन
प्यार तुझसे क्या हुआ, सोचा तुझे बस रात दिन
एहसास में घुलती गयी, तेरा नशा बढ़ा रात दिन
अजनबी बनकर यूँ मिलना, आज फिर दिल चाहता है
नव प्रेम का वह नशा, आज फिर दिल चाहता है

 प्यार के उपवन में आंधी, किस्मत की फिर ऐसी चली
सपनो के पत्ते झड़ गए, ख्वाबो की टूटी हर कली
अरमानो के ठूंठों के बीच फिर बहारे न पली
हो गयी जब तू जुड़ा तो क्या करे ज़िंदादिली
इस निकुंज को फिर बसाना, आज फिर दिल चाहता है
इस ज़िन्दगी में ज़िंदादिली, आज फिर दिल चाहता है 

Tuesday, December 15, 2009

इतिहास लिखेंगे

सच्चे शब्दों में सच के अहसास लिखेंगे,

वक्त पढे जिसको कुछ इतना खास लिखेंगे |

गीत गजल हम पर लिखेंगे लिखने वाले,

हमने कलम उठाई तो इतिहास लिखेंगे ||


आँखों में आँखें डाल के डर को डरायेंगे,

जो हार को हरा दे वो प्रयास लिखेंगे |

तूफ़ान को रोक देंगे मुठ्ठी में भींच के,

है कितना खुद पर वो विश्वास लिखेंगे ||

गीत गजल हम पर लिखेंगे लिखने वाले,

हमने कलम उठाई तो इतिहास लिखेंगे......




हर दबी ज़ुबां में हुंकार ले आयेंगे,

आशाओं की नयी इक बरसात लिखेंगे |

चुन चुन के सपनो को, गुलिस्तां बनायेंगे,

और आने वाले कल को सौगात लिखेंगे ||

गीत गजल हम पर लिखेंगे लिखने वाले,

हमने कलम उठाई तो इतिहास लिखेंगे....

Sunday, December 13, 2009

कवि का कार्य

कठिन कार्य जो कविगण करते, सरल वो दुनिया को लगते हैं,
दुनिया को हरपल यों लगता, हम व्यर्थ ही रातों को जगते हैं....

सबके वश का काम नहीं है, सनाट्टे अनुवादित करना,
मूक़ लबों की बात चुराकर, गूढ़ भाव को साबित करना...
बहते झरनों की कल-कल को, शब्दों में परिभाषित करना,
अविरल बहती पुरवाई को, ठहरा कर संबोधित करना.....

शोषित जन मन की पीड़ा को, ताप भरे शब्दों में कहना,
सीमा सामाजिक लाँघ के भी, अपनी सीमा के भीतर रहना.....
चुप को चुप रखकर भी, चुप के अर्थों को शब्दों में कहना,
चुप के मूक़ वीराने को देना, कुछ संवादों का गहना......

नदिया दरिया झरने झीलें, बिन बोले कुछ कह जाते हैं,
पढ़ लो तो है अनकही गाथा, वरना खाली बह जाते हैं....
असीमित अनुभव संचित कर, चंदा सूरज चुप रह जाते हैं,
इनकी दुर्गम भाषा के भाव, केवल कवि ही कह पाते हैं.....

Wednesday, December 9, 2009

कब जाने खुद को भूल गया

खड़ा रहा उस रस्ते पर,
पर पीछे मुड़ना भूल गया...
न आज के साथ मै चल पाया,
और पिछला कल भी भूल गया....
बड़े नामों की दुनिया में,
मै काम बड़े करता आया....
पर छोटी छोटी बातों पर,
मै खिलकर हँसना भूल गया.....


बिना किसी को साथ लिए,
मै सात समुन्दर फिर आया....
पर घर को जाने वाली नन्ही,
उन गलियों को मै भूल गया.....


कर मेल जोल सब लोगों से,
कई दोस्त बनाए मिल मिल के....
दो लफ्ज़ सुनने को घर बैठी,
माँ से बात मै करना भूल गया.....
खूब कमाई की मैने,
और नाम कमाया दुनिया में....
पर खुद को साबित करने में,
कब जाने खुद को भूल गया....

Saturday, October 17, 2009

कोई खरीददार न रहा

हार के हम बिकने आये, पर आज कोई बाज़ार न रहा,

मायूस खड़े हैं बीच चौराहे, कोई खरीददार न रहा..........


एक समय था गली मोहल्ले, ऊँची बोली लगती थी,

बड़े व्यापारियों के चेहते थे, चमचम रेहड़ी सजती थी,

वही पुराने जमघट लगते, बस हमसे साक्षात्कार न रहा.....

मायूस खड़े हैं बीच चौराहे, कोई खरीददार न रहा..........


हर विज्ञापन की जान भी हम थे, हर मेले का मेहमान भी हम थे,

थे किसी के शौक नवाबी, और जरुरत का सामान भी हम थे,

माल अभी भी वही है खालिस, पर कोई लेनदार न रहा.......

मायूस खड़े हैं बीच चौराहे, कोई खरीददार न रहा..........